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Saturday, May 18, 2024

Navratri नवरात्रि 2023। मुहूर्त । मंत्र।

हर देवी भक्त को नवरात्रि का बेसब्री से इंतजार रहता है।नवरात्रि के दौरान जो भी व्यक्ति सच्चे मन से मां दुर्गा की पूजा करता है, देवी मां उन पर हमेशा अपनी कृपा बनाए रखती हैं।

नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है *9 शुभ रातें* जिनमें देवी मां की बहुत ही भक्तिभाव से पूजा की जाती है। इन 9 दिनों में देवी दुर्गा के 9 अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, हर दिन अलग-अलग रूप की पूजा होती है। इन दिनों में रात में पूजा करने का विशेष स्थान है, जिससे इसे नव-रात्रि (9 रातें) का नाम मिलता है।

Navratri नवरात्रि

इन दिनों में आप अक्सर मां दुर्गा के भजन, मंत्र जाप, प्रार्थनाएं और जागरण-जगराते सुनते रहते हैं।दुनिया के हर कोने में लोग आपको डाण्डिया खेलते दिख जाएंगे, खासकर गुजरात में। पूरे पश्चिम बंगाल में मेलों (कार्निवल), बाज़ारों का आयोजन देखा जा सकता है। साथ ही पूजा के लिए बड़े स्थानों जिन्हें पंडाल कहा जाता है, उनका आयोजन होता है, जहाँ माँ दुर्गा की विशाल मूर्तियों को सजाया जाता है, और 10वें दिन दशहरा/विजयादशमी पर बड़ी धूमधाम से मूर्तियाँ श्रद्धापूर्वक तालाबों, नदियों या समुद्र में विसर्जित की जाती, है जिसे मूर्ति विसर्जन कहा जाता है।

 

Navratri नवरात्रि 2023 मुहूर्त पंचांग  :-

हिन्दू कैलेंडर/पंचांग के अनुसार, इस साल 2023 की नवरात्रि 14 अक्टूबर रात 11:30 बजे से शुरू है, इसलिए 15 अक्टूबर, रविवार सुबह से मनाई जा रही है।

30 साल बाद चित्रा नक्षत्र, और बुधादित्य योग में इस बार नवरात्र का शुभारंभ होगा. माता के भक्तों को खुशी है कि पिछले साल की तरह मां दुर्गा इस बार भी हाथी (गज) पर सवार होकर आ रही हैं

– दरअसल हर साल 4 नवरात्रि होती हैं – 2 बड़े धूम धाम से उत्सव के साथ मनाई जाती हैं, जिनके बारे में सभी जानते हैं, इसलिए इन्हें केवल नवरात्रि नाम से ही जाना जाता है और 2 गुप्त नवरात्रि कहलाती हैं जिन्हें गुप्त तरीके से ही मनाया जाता है। ये इस साल की आखिरी नवरात्रि है.

इस वर्ष 4 नवरात्रि दिए गए क्रम में आई हैं:

– माघ (गुप्त) नवरात्रि (22 जनवरी – 30 जनवरी)

– चैत्र नवरात्रि- (22 मार्च- 30 मार्च 2023)

– आषाढ़ (गुप्त) नवरात्रि (19 जून- 27 जून 2023)

आश्विन/शारदीय नवरात्रि (15 अक्टूबर – 24 अक्टूबर 2023)

हिंदू पंचांग के अनुसार पहली नवरात्रि चैत्र की मानी जाती ही, क्योंकि चैत्र मास हिंदुओं में पहला महीना होता है, और ये ही नही, नवरात्रि के पहले दिन से ही हिंदू नव वर्ष की शुरुआत होती है। इसलिए इसका विशेष स्थान है।

दूसरी शारदीय नवरात्रि इसलिए प्रसिद्ध है, क्योंकि इस नवरात्रि के बाद से ही दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारो का समय शुरू होता है। विशेष रूप से पितृ पक्ष/शरद ऋतु के बाद, जिसमें लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनके लिए अनुष्ठान करते हैं, ऐसे शोक वाले समय में, देवी माँ सृष्टि में * सृजन शक्ति *, का प्रभाव लेकर आती हैं।

Navratri नवरात्रि

कलश स्थापना- शुभ मुहूर्त

नवरात्रि के पहले दिन कलश की स्थापना की जाती है। इस वर्ष, कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त 15 अक्टूबर, सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक शुरू होगा।

कलश में पानी (गंगाजल) भर दें, जिसमें अक्षत (चावल),चीनी, सुपारी, हल्दी, दूर्वा घास, इत्र, सिक्का डालें। अब इसके किनारों पर 5 अशोक पेड़ के पत्ते रखें और कलश को ढक दें। कलश की गर्दन पर कलावा/मौली बांध दें। साथ ही तिलक, स्वास्तिक लगाएं।

अब 1 नारियल लें और उसे लाल कपड़े या लाल चुन्नी में लपेट लें। चुन्नी में कुछ पैसे भी रखें और इन सबके ऊपर भी कलावा बांध दें। इसे समापन के दिन प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

साथ ही 1 मिट्टी के पात्र में जौ (ज्वारे) बोने की भी प्रथा है। इसे भी समापन के दिन काटके प्रसाद के रूप में कानों के ऊपर रखा जाता है। इसके लिए मिट्टी के पात्र (घट) लाएं, इसलिए इसे घटस्थापना भी कहा जाता है। इसके लिए इसमें मिट्टी डालें और उसमें जौ के बीज डाल दें , फिर इसमें दोबारा थोड़ी मिट्टी और डाले, और फिर बीज डालें। इन्हे खड़ी अवस्था में डालें, जिससे ये ऊपर की तरफ उगें। फिर थोड़ा सा पानी डाल दे। अब घट के पात्र की गर्दन पर भी कलावा बांध दे। ध्यान रहे, सुबह शाम पानी ज़रूर डालें।

अब लकड़ी की चौकी को गंगाजल से शुद्धि कर अथवा साफ करके सजाने के बाद इन तीनों को माता रानी की मूर्ति के साथ स्थापना करें। पुष्पों और फूलमालाओं से सजाएं।

 

नवरात्रि के दिन

माँ दुर्गा के 9 रूप हैं, प्रत्येक की प्रतिदिन पूजा इस प्रकार की जाती है:

पहला दिन- 15अक्टूबर, रविवार – प्रतिपदा- कलश स्थापना/ मां शैलपुत्री – हिमालय की पुत्री

दूसरा दिन- 16अक्टूबर, सोमवार – माँ ब्रह्मचारणी देवी – तपस्या की देवी

तीसरा दिन – 17अक्टूबर, मंगलवार – माँ चंद्रघंटा – चंद्रमा की देवी (सौंदर्य) और घंटा/पवित्र घंटी (शौर्य)

चौथा दिन – 18अक्टूबर, बुधवार – मां कूष्मांडा – सृजन की देवी, जिनके गर्भ में ब्रह्मांड है

पांचवां दिन – 19अक्टूबर, गुरुवार – मां स्कंदमाता – भगवान स्कंद/कार्तिकेय की माता

छटा दिन – 20अक्टूबर, शुक्रवार – माँ कात्यायनी – ऋषि कात्यायन की पुत्री

सातवां दिन – 21अक्टूबर, शनिवार – मां कालरात्रि – काल (मृत्यु और समय) की देवी

आठवां दिन – 22अक्टूबर, रविवार(महाअष्टमी) – मां महागौरी – देवी पार्वती, भगवान शिव की पत्नी

नौवां दिन – 23अक्टूबर, सोमवार (महानवमी / रामनवमी) – मां सिद्धिदात्री – सिद्धियों/शक्तियों को देने वाली देवी – इसी दिन विष्णु अवतार भगवान श्री राम का जन्म हुआ था।

दसवां दिन – 24अक्टूबर, मंगलवार – मूर्ति विसर्जन दशहरा/विजयदशमी (इसी दिन प्रभु श्री राम ने रावण का वध किया था) इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के दिन के रूप में मनाया जाता है। इसलिए रावण का पुतला जलाया जाता है।

Navratri नवरात्रि

नव दुर्गा देवी के मंत्र और पूजा विधि :-

नवरात्र के दौरान नव दुर्गा के इन बीज मंत्रों की प्रतिदिन की देवी के दिनों के अनुसार मंत्र जाप करने से मनोरथ सिद्धि होती है। हो सके तो 108 (माला) जाप करें।

1. शैलपुत्री- ह्रीं शिवायै नम:।

2. ब्रह्मचारिणी- ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:।

3. चन्द्रघण्टा- ऐं श्रीं शक्तयै नम:।

4. कूष्मांडा- ऐं ह्री देव्यै नम:।

5. स्कंदमाता- ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:।

6. कात्यायनी- क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम:।

7. कालरात्रि – क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:।

8. महागौरी- श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:।

9. सिद्धिदात्री – ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:।

इन मंत्रों से जाप करने में मुश्किल हो तो सबसे आसान इस मंत्र का जाप 108 बार करें।

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ।

Navratri नवरात्रि

समापन व कन्या पूजन (कंचक) विधि :-

कुछ लोग अष्टमी को तो कुछ नवमी को नवरात्रि का समापन करते हैं। अधिकांश लोग नवमी में समापान करते हैं। कई लोग पूरे नवरात्रि व्रत रखते हैं और आखिरी दिन नवमी को कन्या पूजन के साथ अपने व्रतों का समापन करते हैं।

इसमें कन्या को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। इसे ही कंचक जिम्हाना या कन्या जिम्हाना कहते हैं। इस परंपरा में, 9 कन्याओं को 9 देवियों के रूप में पूजने के लिए घर पर आमंत्रित किया जाता है।

इसीलिए अष्टमी और नवमी में सुबह के समय तो पूरे समाज में चहल पहल रहती है, खासकर लड़कियों के घर में। कम से कम एक लड़के को हनुमान जी के रूप में भी आमंत्रित किया जाता है जिसे लंगूर कहा जाता है।

परंपरागत रूप से, उनके पैर धोए जाते हैं और चरणस्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है ये प्रार्थना कर- हे देवी, कृपया इन बच्चों के रूप में हमारे घर आकर आशीर्वाद दें। उनके माथे पर तिलक लगाया जाता है, उनकी कलाइयों पर राखी/कलावा बांधा जाता है। फिर आरती करके प्रसाद दिया जाता है. उपहार और भोजन जिसमें खीर, चना, हलवा, पूरी से बनाया जाता है।

आजकल, लोग आम तौर पर अपनी इच्छा और शक्ति के अनुसार चॉकलेट, मिठाई, ज्योमेट्री बॉक्स, जूस बॉक्स, कुकीज़ के रूप में उपहार देते हैं। अंत में आशीर्वाद लेकर उन्हें दोबारा विदा किया जाता है।

 

नवरात्रि विशेष पूजन विधि :-

नवरात्रों में दुर्गा चालीसा और दुर्गा कवच का पाठ/जप लाभकारी माना जाता है। यदि संभव हो तो दुर्गा सप्तशती का पाठ करें क्योंकि यह अत्यंत फलदायी है। दुर्गा सप्तशती वास्तव में तंत्र साधनाओं वाला एक ग्रंथ है, इसलिए इसमें अनुष्ठानों को सही ढंग से करना आवश्यक है, इसलिए ही इसे आमतौर पर आम जनता से गुप्त रखा गया था।

इसे पढ़ते समय इसीलिए आपको पता चलेगा की ये बिना सही विधि के शापित विधि ही, आसान भाषा में इसका गलत तरह से पाठ नही करना चाहिए, और कीलक और मंत्रों द्वारा ही इसे पढ़ने की आज्ञा है। आजकल यह बाजारों और ऑनलाइन स्टोरों में आसानी से उपलब्ध है, लेकिन चूंकि यह एक तंत्र आधारित पुस्तक है, इसलिए आसानी से समझने और सटीकता के लिए इसे हिंदी या अपनी स्थानीय भाषा में ही खरीदा जाना चाहिए। हम सबसे पुराने और भरोसेमंद प्रकाशन में से एक – *गीताप्रेस गोरखपुर* की सलाह देंगे, जिसे नीचे दिए गए लिंक से खरीदा जा सकता है।

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यहां प्रत्येक पुस्तक को प्रतिष्ठित पंडितों द्वारा कई स्तरों पर प्रूफ-रीडिंग यानी प्राथमिकता जांचने के बाद ही प्रकाशित किया जाता है।

फिर भी आपको यदि कोई संदेह हो, तो इसे पढ़ने के तरीके के बारे में अपने नजदीकी जानकार पंडित से भी सलाह लें।

 

चैत्र नवरात्रि 2024

पहला दिन- 9 अप्रैल, मंगलवार – प्रतिपदा- कलश स्थापना/ मां शैलपुत्री – हिमालय की पुत्री

दूसरा दिन- 10 अप्रैल, बुधवार – माँ ब्रह्मचारणी देवी – तपस्या की देवी

तीसरा दिन – 11 अप्रैल, गुरुवार – माँ चंद्रघंटा – चंद्रमा की देवी (सौंदर्य) और घंटा/पवित्र घंटी (शौर्य)

चौथा दिन – 12 अप्रैल, शुक्रवार – मां कूष्मांडा – सृजन की देवी, जिनके गर्भ में ब्रह्मांड है

पांचवां दिन – 13 अप्रैल, शनिवार – मां स्कंदमाता – भगवान स्कंद/कार्तिकेय की माता

छटा दिन – 14 अप्रैल, रविवार – माँ कात्यायनी – ऋषि कात्यायन की पुत्री

सातवां दिन – 15 अप्रैल, सोमवार – मां कालरात्रि – काल (मृत्यु और समय) की देवी

आठवां दिन – 16 अप्रैल, मंगलवार(महाअष्टमी) – मां महागौरी – देवी पार्वती, भगवान शिव की पत्नी

नौवां दिन – 17 अप्रैल, बुधवार (महानवमी / रामनवमी) – मां सिद्धिदात्री – सिद्धियों/शक्तियों को देने वाली देवी – इसी दिन विष्णु अवतार भगवान श्री राम का जन्म हुआ था।

दसवां दिन – 18 अप्रैल, गुरुवार – मूर्ति विसर्जन – दशहरा/विजयदशमी (इसी दिन प्रभु श्री राम ने रावण का वध किया था) इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के दिन के रूप में मनाया जाता है। इसलिए रावण का पुतला जलाया जाता है।

 

शारदीय नवरात्रि 2024

पहला दिन- 3 अक्टूबर, गुरुवार – प्रतिपदा- कलश स्थापना/ मां शैलपुत्री – हिमालय की पुत्री

दूसरा दिन- 4 अक्टूबर, शुक्रवार – माँ ब्रह्मचारणी देवी – तपस्या की देवी

तीसरा दिन – 5 अक्टूबर, शनिवार – माँ चंद्रघंटा – चंद्रमा की देवी (सौंदर्य) और घंटा/पवित्र घंटी (शौर्य)

चौथा दिन – 6 अक्टूबर, रविवार – मां कूष्मांडा – सृजन की देवी, जिनके गर्भ में ब्रह्मांड है

पांचवां दिन – 7 अक्टूबर, सोमवार – मां स्कंदमाता – भगवान स्कंद/कार्तिकेय की माता

छटा दिन – 8 अक्टूबर, मंगलवार – माँ कात्यायनी – ऋषि कात्यायन की पुत्री

सातवां दिन – 9 अक्टूबर, बुधवार – मां कालरात्रि – काल (मृत्यु और समय) की देवी

आठवां दिन – 10 अक्टूबर, गुरुवार (महाअष्टमी) – मां महागौरी – देवी पार्वती, भगवान शिव की पत्नी

नौवां दिन – 11 अक्टूबर, शुक्रवार (महानवमी / रामनवमी) – मां सिद्धिदात्री – सिद्धियों/शक्तियों को देने वाली देवी – इसी दिन विष्णु अवतार भगवान श्री राम का जन्म हुआ था।

दसवां दिन – 12 अक्टूबर, शनिवार – मूर्ति विसर्जन – दशहरा/विजयदशमी (इसी दिन प्रभु श्री राम ने रावण का वध किया था) इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के दिन के रूप में मनाया जाता है। इसलिए रावण का पुतला जलाया जाता है।

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